Thursday, January 1, 2026

66. दादी मेरी परम धाम चली गई ।

 थम गई अब वो आवाज
जो कभी चीख चीख कर बुलाती थी। 
थम गई अब वो आवाज,
जो कभी पूरे घर में गूंजती थी। 
ना सुनाई दे जब आवाज 
तो बार बार फोन करके बुलाती थी। 
थम गई अब वो आवाज,
जो मेरे कानों में बार बार सुनाई देती थी। 

प्रसंग चाहे जो हो खास.
तकलीफ चाहे जो हो पास, 
 बस आवाज एक ही आती...! 
"रख विश्वास उस बाबा का 
जो साथ खड़ा है जब कोई ना हो पास"
हर दर्द की बस एक ही दवा देती थी, 
वो बाबा के जल और भगभूत को painkiller बना देती थी। 
थम गया वो सूत्र विश्वास जगाने का, 
जिसमें उत्साह भर दे वो निर्जीव का।  

थम गया अब वो कमरा,
जो कभी पूरे घर को जोड़ता था। 
थम गया अब वो मंदिर,
जो दादी के बल का प्रतीक था। 
जो गवाह था 88 सालों के सफर का। 
थम गई अब वो आँखें,
जो दिल की बाते आँखों से कहती थी। 
हर प्रसंग की गवाही वो  आँखें  देती थी। 
 
वो बल की धनी थी। 
शास्त्रों का अध्ययन कर वो पंडित थी। 
गलती की सजा वो निडर देती थी। 
थम गई अब वो सिख,
जो सही गलत की पहचान समझाती थी। 
थम गया अब वो एक युग,
जो बस एक याद बनकर रह गई।  
जहाँ से आई थी, वहां वापस लौट गई। 

एक अध्याय को बंद कर,
पूरी किताब खुली छोड़ गई। 
दादी मेरी हमें छोड़ अपने परम धाम चली गई।