Monday, March 15, 2021

41. Nikita !!! Memories of Friendship....


अनजान एक दूसरे से हम tuition में साथ थे 
ना कभी बाते कि, ना कभी एक दूसरे को देखा 
पर लगते एक दूसरे को हम गवार थे। 

ना जाने वो वज़ह क्या थी,  बाते करना बस  शुरू ही हुई थी,
धीरे-धीरे एक दूसरे को पहचानने लगे 
दोस्ती गहरी हमारी दिलो पर होने लगे। 

वक्त के साथ दोस्ती हमारी पक्की होती गई,
हम घंटो बाते करते, छुप छुप कर बरपेटा में मिलते,
flirt करते, घूमने जाते, छीकते -चिलाते 
और हर मुश्किल में एक दूसरे  के साथ रहते। 

कुछ दोस्तों ने हमारी दोस्ती को कुछ और ही नाम दिया था ,
Friends with benefits जैसा कुछ  भी बस सुनना आदत सा हो गया था। 
Now the best part !!!! सफाई देना जरुरी नहीं समझा हमने, 
जैसा वो सोचते है वैसा ही जताना जरुरी समझा हमने ,
और शायद यही  वो वज़ह  है एक दूसरे का साथ तोडना नहीं जोड़ना सीखा हमने। 

Baby, Darling, Janu, Sweetheart तो common सा हो गया था, 
पर उस से भी बढ़कर एक care वाली feeling हमेसा थी दिल पर। 
याद रहेगा मुझे हर वो new year ,
जब दारू पीकर तू होती पूरी तरह से भंड । 

साथ उम्र भर ज़िन्दगी का जुड़ा तेरा और मेरे यार अनुज का,
जिसकी वज़ह  indirectly मैं   बना। 
और वो धमकियों भरा call जो मिलता उस बिचारे को, 
वज़ह   बस वही थी तेरे चेहऱे  पर उदासी ना कही हो। 

नया मोड़ अब ज़िन्दगी में आने वाला है तेरे,
नये लोग होंगे, नई जगह होगी, 
मुझसे पहले अब कई अटूट रिश्ते होंगे तेरे। 

शब्द शायद कम होंगे हमारे इस अनूठे दोस्ती को जताने को ,
याद तेरी नहीं आएगी, ये  झूठी तसली नहीं दे सकता अपने मन को। 
पर एक वादा रहा, मुस्किलो में अगर याद करेगी 
तो मुझे भी पायेगी अपने साथ को। 










Sunday, February 14, 2021

40. Find the Actual ....."YOU"

कहीं खुद में तो ना खो गया तू...|
कहीं खुद में तो ना खो गया तू ...|

तू  हर सुबह आईने में अपने आप को देखता है, 
पर अपने चेहरे पर शायद गौर नहीं करता कभी । 
सच्च कहु तो तू  बस अपने बालो को ही सवारने में रह जाता है 
तू बस चेहरे पर नकाबों का लेप मलता चला जाता  है, 
उन नकाबों के पीछे तू अपने चेहरे को छिपाता है  
क्या उन नकाबों के बिच तू कहीं  खो तो नहीं जाता हैं ? 

तू हर पल किसी ओर  के लिए जिता है,
तू हर पल किसी ओर  चिंता में डूबा रहता है ,
तू हर पल किसी और खयालो में  खोया रहता है। 
तू हस्ता किसी ओर  के लिए है,
तू रोता भी शायद किसी ओर  के लिए ही है, 
मै अब तक समज ही  न पाया तू अपने लिए जीता कब है |
क्या किसी ओर के लिए तू कहीं खुद में   तो ना खो गया है ?

तेरे चेहरे पर कभी गुस्सा नज़र आता है 
तेरे चेहरे पर कभी मायूसी नज़र आती है 
तो कभी तेरे चेहरे पर उदासी नज़र आती है 
क्या तुझे याद है कब पिछली बार खुले मन से तू हँसा है 
इतने चेहरों में कहीं तेरा असली चेहरा तो खो नहीं गया है । 

हर दिन एक तेरा नया रूप सामने दिखता है,
कभी शराफत का तो कभी बेईमानी का, 
कभी भोलेपन का तो कभी हद से ज्यादा चालाकी का, 
इस भीड़ मै क्या तुझे याद है... 
रूप तेरा असली है कौन सा ?

नकाब इतने सारे चेहरे पर तूने अपने लगाए है
कौन सा उनमे तू है क्या तुझे पता है ??

एक बार ठहर कर सुबह आईने में खुद को  पहचान ले  
शायद कहीं तेरा खोया हुआ चेहरा तुझे याद आ जाये | 
शायद कहीं तेरा खोया हुआ चेहरा तुझे याद आ जाये | 























Friday, January 15, 2021

39. One Festival but Different Names

 एक ही त्यौहार है 
पर अलग अलग है नाम ,
कही मनता बिहू तो कोई मनता पोंगल 
कही मनता लोहरी तो  कही मनता संक्रांत है । 

कही खुले आसमान में उड़ता पतंग है,
तो कही जलता भेला-घर है,
कही बनता तिलकुड़ तो कही पीठा है
पर स्वाद जुड़ता दोनों का आकर दिल पर है ।

अलग भाषाएँ है और अलग है संस्कृति 
पर मतलब सबका आकर रुकता प्रकृति पर  है। 








Monday, December 28, 2020

38. Request V/s Threat.

As of yesterday, when I went to a government department in connection with a tender, I saw that people from all over the country have come to participate in the tender.

At the same time, a Delhi based company had also come to participate and when that company was in the process to submit the tender, some local suppliers came there with their team and threatened to not submit the  tender to the Delhi company. When the team from Delhi told that according to every clause of the tender document, they are eligible to participate upon the tender even the company has its branch office in their state, yet they were not hearing and were constantly disarmed, constantly threatened.

Now when the matter reached to the company's Directors, by then the company's reputation came on stake. The company refused to accept those local supplier's argument. Directors of the company used their links, reaching the police. State police, media all reached there.

After the arrival of police and media, things started getting worse. Gradually, those local suppliers started to realize that they are adopting the wrong way because after constant intimidation, that company is not changing its intention even after threatening. After discussing with each other for some time, they decided that they should apologize to the company and request not to participate in the tender. All of them once again went to the members of the company with their team and this time they requested but not threatened.

Their request was accepted, the company refused to participate upon the tender. This was only upon the request of local suppliers. Those local suppliers did not have to work too hard to request as much as they had done in threatening them.

It often happens with us Instead of having Works done by request we initiate it by threat. And Subsequently the work get spoiled.

___________________________________________________________________________________(Hindi Translation)


कल की ही बात है , एक सरकारी department में किसी tender के सिलसिले में गया था तो वहां देखा कि Tender में भाग लेने के लिए देश भर से भी  लोग आये है। 

वहीं पर एक दिल्ली की कंपनी भी आई हुई थी और जब वो कंपनी Tender दाल रही थी तो वहां के कुछ local suppliers अपनी team के साथ आकर दिल्ली की कंपनी को tender ना डालने की धमकी देने लागे, उनसे बुरा बेवहार करने लागे, पिटवा देने की बात करने लागे।  जब दिल्ली की team ने ये बताया कि  Tender document के हर clause के हिसाब से वो लोग tender डालने में सक्षम है, कंपनी की  Branch office उनके राज्य में है, फिर भी वो लोग नहीं मान  रहे थे और लगातार बेहेस कर रहे थे, लगातार धमकिया दे रहे थे। 

अब जब बात पहुंची कंपनी के Directors तक, तब तक कंपनी की reputation पर बात आ गई थी। कंपनी ने उन local suppliers की बात को मानने से बिलकुल इंकार कर दिया। कंपनी के directors ने अपने Links का इस्तमाल किया, Police तक बात पहुंच गई।  State पुलिस, Media सब वहां  पहुंच गई। 

Police और media के आने के बाद बात और ज्यादा बिगड़ने लगी।  धीरे-धीरे उन local  suppliers को ये एहसास होने लगा कि वो लोग गलत तरीका अपना रहे है क्योकि लगातार डराने के बाद, धमकिया देने के बाद भी वो कंपनी अपना इरादा नहीं बदल रही । कुछ देर आपस में discuss करने के बाद उन्होंने ये decide किया कि उन्हें कंपनी से माफ़ी मांगनी चाहिए और Tender ना डालने के लिए Request  करना चाहिए। वो सब एक बार फिर अपनी Team  साथ कंपनी के members के पास गए और इस बार उन्होंने धमकी नहीं request कि। 

उनकी request क़ुबूल हो गई, कंपनी ने local suppliers की request पर tender ना डालने का नकि किया | उन  local suppliers को request करने में ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ी जितना उन्होंने धमकिया देने में  कर दी थी। 

अक्सर ऐसा होता है हमारे साथ कि जो काम हम REQUEST से कर सकते है वहां हम अपनी ego के चलते खोकले धमकियों से करते हैऔर हमारा काम बिगड़ता है।   



Saturday, December 12, 2020

37. A Small Break Is Always Much Needed Therapy,

A person had once said a very good thing that when we are frustrated with our daily work, then he should just take a leave for a few days so that after a change we again charge-up.

After Lockdown everyone wanted a change, I also wanted to.

For the last two days I had gone to the wedding of my friend's brother where I met some friends of my hostel, senior, junior. Seeing this meeting of ours, it forced the pages of old memories to turn. We once again experienced  the same hostel's day. One special thing was that there was no discrimination of senior-juniors in this meeting, but what was there was happiness to meet the hostel fellows in the face of everyone. The same old memories, the same old stories, as if the night became short, but the talks did not end.

We danced, enjoyed every ritual, as if he lived his life once again for two days. No where was there any sadness or worry on the face of anyone, just there was a glimpse of laughter on everyone's face.

After these two days of fun, today it felt like I am completely relaxed, and the energy to work has doubled.




-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------(HINDI TRANSLATION)


एक इंसान ने एक बहुत अच्छी  बात कही थी कि जब अपनी रोज मरात के कामो  से परेशान हो जाओ तो कुछ दिनों के लिए कही घूम आना चाइये ताकि एक change के बाद हम फिर से charge-up हो सखे। 
Lockdown के बाद हर कोई एक change चहाता था , मुझे भी चाहिए था। 

बिते दो दिन मैं  Bokakhat, अपने दोस्त के भाई की शादी में गया था वहां अपने hostel के कुछ दोस्तों से, senior से, junior से मिला। हमारी ये मुलाकात नजाने कितने पुराने यादो के पन्नो को पलटने में मजबूर कर दिया। हमने फिर एक बार वही hostel के दिंनो को जी लिया। एक खास बात ये थी कि इस मुलाकात में कोई senior-junior का भेदभाव नहीं था, पर जो था वो था सबके चेहरे पर अपने hostel वालो से मिलने कि ख़ुशी। वही पुरानी बाते, वही पुराने किस्से , मानो वो रात छोटी हो  गयी पर बाते खत्म  नहीं हुए। 

दिल खोल कर dance किया, हर एक रसम का मजा लिया, मानो ये दो दिन फिर एक बार अपनी ज़िन्दगी को ही जी  लिया। कहीं भी किसी के चेहरे पर उदासी या चिंता नहीं थी बस हसीं सबके चेहरे पर झलक  थी। 

इन दो दिंनो कि मस्ती के बाद आज ऐसा लगा जैसे पूरी  तरह से relax हूँ, और काम करने की energy बिलकुल दुगनी हो गई। 








Thursday, November 19, 2020

36. Childhood disappears with increasing age.

क्यों ऐसा होता है !!!
बढ़ते उम्रः के साथ बचपन कही गुम  होता चला जाता है।
क्यों ऐसा होता है !!! 

जिन vacations का इंतज़ार हम पुरे महीनो -साल करते थे, उन्ही vacations को एक बार फिर जीने को जी चाहता है,
क्यों ऐसा होता है !!!
बढ़ते उम्रः के साथ बचपन कही गुम होता चला जाता है।
  
सपना था जो कुछ बनने का, जो हर रोज बदलता था, 
कभी सोचते डॉक्टर बनना है तो कभी इंजीनियर, 
तो कभी सोचते Lawyer बनना है तो कभी Singer,
पर बनते वो है जो नियति ने हमारे लिए सोचा है। 
क्यों ऐसा होता है !!!
बढ़ते उम्रः के साथ बचपन कही गुम होता चला जाता है।  

College में वो यारो की unity, जिनसे भिड़ने से पहले एक बार तो college का management  भी घबराता था, 
आज उन्ही यारो के साथ एक बार फिर उन दिंनो को जिने का मन करता है। 
क्यों ऐसा होता है !!!
बढ़ते उम्रः के साथ बचपन कही गुम होता चला जाता है।  

त्यौहार जिनका इंतज़ार महीनो से लगा रहता था, आज एक calendar की date की तरह निकल पड़ता है। 
जिन birthday के लिए 20 days to go, 15 days to go, 10 days to go लगा रहता था, 
आज वही birthday एक गुमनाम date की तरह निकल पड़ता है। 
क्यों ऐसा होता है !!! 
बढ़ते उम्रः के साथ बचपन कही गुम होता चला जाता है।  

कभी रोज एक ऐसा दिन भी था जब सुबह की शुरूवात से चहरे पर एक गज़ब सा  रौनक दिखता था,
पर क्यों आज दिन भी खत्म हो जाता है पर कंधे का बोझ कम नहीं होता। 
शरारते  जो हम  करते थे वो बचपन में नादानी थी पर अगर आज करे तो गुनाह बन जाता है। 
क्यों ऐसा होता है !!! 
बढ़ते उम्रः के साथ बचपन कही गुम होता चला जाता है।  

यु तो शायद ये संभव नहीं पर कुदरत के आगे सबका सर झुकता है,
बचपन को एक बार फिर जिने का मन करता है। 
क्यों ऐसा होता है !!! 
बढ़ते उम्रः के साथ बचपन कही गुम होता चला जाता है।  
बचपन कही गुम होता चला जाता है।  







Monday, November 16, 2020

35. THE LEFT OUT TIME.

 कल एक बात का एहसास हुआ कि हमारा बचपन बहुत जल्द बित गया। आज बहुत दूर आ गए है हम। 

कल गुवाहाटी से आते वक्त सिर्फ 5 मिनट के लिए अपने ननिहाल पाठशाला गया था। पाठशाला गए हुए मुझको कम से कम 2-3  साल बित गए थे। इसमें सबसे बड़ी आश्चर्य बात मुझे ये लगी कि पाठशाला का नक्शा ही बदल गया और जहां हम महीनों बचपन बिताते थे, जिन गलियों कि रौनक हम बढ़ाते थे आज वही गलिया मुझे अनजानी सी लगने लगी, मैं अपने ननिहाल को ही नहीं पहचान पाया। पहली बार अपने ननिहाल को शहर की चकाचौंद के बिच ढूंढना पड़ा। 

उस दिन ये एहसास हुआ कि क्या सच्च में ये वहीं पाठशाला है जहां छुट्टियों में हम महीनों रहकर आते थे। क्या सच्च में हम इतने बड़े हो गए हम !!!!

उम्रः के साथ साथ जिम्मेदारियां बद रहीं है और उसी के साथ समय बीतता चला जा रहा है और पुरानी यादे बस दिल के संदूक में दबे चले जा रहे है।