Thursday, January 1, 2026

66. दादी मेरी परम धाम चली गई ।

 थम गई अब वो आवाज
जो कभी चीख चीख कर बुलाती थी। 
थम गई अब वो आवाज,
जो कभी पूरे घर में गूंजती थी। 
ना सुनाई दे जब आवाज 
तो बार बार फोन करके बुलाती थी। 
थम गई अब वो आवाज,
जो मेरे कानों में बार बार सुनाई देती थी। 

प्रसंग चाहे जो हो खास.
तकलीफ चाहे जो हो पास, 
 बस आवाज एक ही आती...! 
"रख विश्वास उस बाबा का 
जो साथ खड़ा है जब कोई ना हो पास"
हर दर्द की बस एक ही दवा देती थी, 
वो बाबा के जल और भगभूत को painkiller बना देती थी। 
थम गया वो सूत्र विश्वास जगाने का, 
जिसमें उत्साह भर दे वो निर्जीव का।  

थम गया अब वो कमरा,
जो कभी पूरे घर को जोड़ता था। 
थम गया अब वो मंदिर,
जो दादी के बल का प्रतीक था। 
जो गवाह था 88 सालों के सफर का। 
थम गई अब वो आँखें,
जो दिल की बाते आँखों से कहती थी। 
हर प्रसंग की गवाही वो  आँखें  देती थी। 
 
वो बल की धनी थी। 
शास्त्रों का अध्ययन कर वो पंडित थी। 
गलती की सजा वो निडर देती थी। 
थम गई अब वो सिख,
जो सही गलत की पहचान समझाती थी। 
थम गया अब वो एक युग,
जो बस एक याद बनकर रह गई।  
जहाँ से आई थी, वहां वापस लौट गई। 

एक अध्याय को बंद कर,
पूरी किताब खुली छोड़ गई। 
दादी मेरी हमें छोड़ अपने परम धाम चली गई। 













Wednesday, August 20, 2025

65. दादी सब जानती है।






Wednesday, August 30, 2023

64. भाव भरी श्रद्धांजलि ||




क्या ये सच हैं?
क्या हम ये मान ले ?
जो कल तक आप साथ थी ! आज नहीं ?
क्यों बिलक्ति हमें छोड़ गई ?
शायद आपकी जरुरत उस ईश्वर को हमसे ज्यादा थी। 

आत्मविश्वास से भरी और सबको हिम्मत देती आप थी। 
जीवन के संघर्ष को आप आसानी से संभाल लेती थी। 
भक्ति रस में डूबी रहती और दादी की कृपा आप पर थी। 
कैसे याद ना करू उन हाथो को,
जो बड़े प्यार से मेरे सिर को सहलाती थीं। 

भयंकर बिमारी से हस्ते हस्ते लड़ गई, 
वो सुरवीर महानारी आप थी। 
हालातों से डरना नहीं बस आगे भड़ना है 
ये सिख आप हमको दे गई। 
भरोसा  रखकर अपने नाम का डंका खुद  बजाया,
वो कृष्णम बुटीक के नाम से अपना नाम खुद बनाया। 
कैसे याद ना करू उन पकवानो को,
जो बड़े प्यार से आप बनाकर खिलाती थी। 

शायद ही कोई आँखे  आपकी बिदाई पर ना रोइ होगी, 
सेहम गए सब और पिछे अकेला हम सब को छोड़ गई।
सिखाया तो बहुत है आपने पर नजाने कितना संभल पाएंगे, 
पास ना होकर भी शायद आपको मेहुस हम करते रहेंगे। 

याद आपकी नहीं आएगी, ये बोलना तो संभव नहीं होगा 
पर आप अपना हाथ हम पर रखना 
ये  मेहसूस आपके होने का हमें दिलाएगी। 











Wednesday, September 28, 2022

63. नारी साधारण नहीं ||

                                      

तू ज्वाला है, तु शांत शीतल छाया भी हैं,
तू बहती धारा है, तू क्रोध से भरी सुनामी भी हैं।
तुझी में लक्ष्मी बाई है, तू ही मीरा है
तुझी से ये जग है, तुझी से मेरा घर है। 
तू नारी है, तू साधारण नहीं
तुझी में दुर्गा सरस्वती है।

तू ना साधारण , शक्ति तेरी विशाल है
हाथ उठा दे तो वो आशीष बन जाए
और मुट्ठी बंद ले तो वो अंत हो जाए ।
तू अबला नहीं, शांत रहना बस तेरी आदत है 
कमजोर समझा जिन राक्षसों ने तुझे 
दुनिया से उनका वजूद उजड़ चुका  है ।
तू नारी है, तुझी में महाकाली है ।

रोक ना पाया कोई, कोशिशे हज़ार हुई है 
जब बात आत्मविश्वास की आई हैं। 
अंतरिक्ष में जो पहुंच गई वो कल्पना हैं, 
बिना पैर जो एवेरेस्ट चढ़ गई वो अरुणिमा हैं। 
हालातो को झुका दे , वो शक्ति तुझमें है।
तू नारी है, तुझी में मां आदी शक्ति है ।

तू मां बनकर प्यार लुटती है,
हर पल तैयार, थकती नहीं है।
तू घर में खुशियां बिखेरती है,
तू घर से निकल देश को चलती है। 
तू नारी है, तू ही  महालक्ष्मी है ।

जब बात आई स्वाभिमान की
तो क्रूरता का संहार किया वो तू ही फूलन देवी है ।
ये नवरात्र है, शक्ति का स्वरूप तुझमें है। 
बांड मुट्ठी, तोड़ जंजीरे,
ये समाज तुझे क्या रोकेगा
तू खुद एक उड़ता परिंदा है ।
















Monday, September 26, 2022

62. Be Proud !!!! "You are a Agarwal"

कहते है कि किसी भी समाज का धरोहर उसका इतिहास होता हैं। और अग्रवंश का इतिहास हर एक अग्रवाल को गर्व मेहसूस करवाता हैं। 

अग्रवाल वंश के राजा महाराज अग्रसेन जी ने 5900 साल पहले ही अग्रवाल समाज के भविष्य कि परिकल्पना कर ली थी। ये 5 बातें जो आज मैं यहाँ लिख रहा हूँ, आपको एक अग्रवाल होने पर गर्व मेहसूस करवाएगा। 

1. महाराज अग्रसेन ने एक ईंट  - एक रुपया की प्रथा शुरू करवाई थी जिसका मतलब हैं कि कोई भी  जब अग्रोहा में बसने आता था तो अग्रोहा शहर  के हर घर से उस इंसान को एक ईंट और एक रुपया दिया जाता था। एक ईंट इसलिए ताकि वो एक-एक ईंट से अपना घर बना सके और एक रुपया इसलिए ताकि एक-एक रुपया जमा कर वो  नया व्यापार कर सके। 

यहाँ महाराज अग्रसेन जी ने 2 बाते सिखाई। पहली Teamwork, अगर लोगो का साथ मिलता रहा तो हर कोई कामयाब हो सकता हैं।  दूसरा Business Development, महाराज अग्रसेन जी से व्यापार को बढ़ावा दिया नाकि नौकरी को। 

इसलिए कोई भी अग्रवाल ज्यादा दिन तक किसी कि नौकरी नहीं कर सकता। देर-सवेर ही सही पर व्यापार तो करेगा ही।  व्यापार खून में जो दाल दिया था इन्होने। 

2. एक दिन महाराज अग्रसेन की सभा चल रही थी कि महाराज के मंत्री ने हिचकीचाते  हुए महाराज से कहाँ -"महाराज आपके पिताजी का एक सपना था जो आपने अभी तक पूरा नहीं किया।"

महाराज भी आश्चर्य से पूछे कि ऐसा कौनसा अधूरा सपना हैं  उनके पिताजी का जिसे अभी तक वो पूरा नहीं कर पाये 

मंत्री ने जवाब दिया कि उनके पिताजी चाहते थे कि अग्रोहा में एक भव्य महल का निर्माण हो जिसमे हर एक सुख-सुविधा  मौजूद हों। 

महाराज ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया की महल उनके पिताजी का सीर्फ एक सपना था, ज़िद  नहीं।  महाराज अपना धन महल बनाने में खर्च नहीं करना चाहते थे जो आने वाले समय में सीर्फ लोगो के मनोरंजन का ही पात्र रहेगा और किसी को इस से कोई फ़ायदा नहीं होगा। इसके बदले महाराज अपना धन व्यापार, कला, में लगाना ज्यादा जरुरी समझा जिससे आने वाले समय में लोगो का और साथ ही साथ समाज का भी भला होगा।  हर किसी का लाभ होगा। 

Investment की better  strategy की  निभ तो  उसी दिन रख दी गई थी। आज भी जब अग्रवाल invest करता है तो आने वाले लम्बे समय तक का लाभ पहले ही अंकित कर लेता है। 

3. महाराज अग्रसेन ने माँ लक्मी की कड़ी तपस्या कि थीं जिससे  फल स्वरुप उन्हें ये वरदान मिला कि माँ लक्मी अग्रवंश की  कुल देवी कहलाएगी। सुख और समृद्धि हमेसा अग्रवंश में रहेगी। 

इसलिए हालात चाहे जैसे भी हो पर हर  अग्रवाल अपने मेहनत कि रोटी खुद कमाता हैं।  रास्ते में चलते हर एक अग्रवाल को देखकर यही लगता हैं कि बंदा अच्छे पैसे वाले और संस्कारी घर से हैं। 

4. हमारे राजा-महाराजा छत्रिया हुआ करते थे पर महाराज अग्रसेन जन्म से एक बैसि जाती के थे। एक बैसि जाती के होने के बावजूद  अपनी सूद -बुद और बहादुरी के कारण छत्रिया होने का सम्मान मिला और चवर, छत्र, तलवार धारण करने का सम्मान मिला। 

इसलिए जब घर में शादी होती हैं तब दूल्हे को इस कदर सजाया जाता है - सर पे किलंगी,   ऊपर छत्र  और कमर पे तलवार धारण कर इसकदर बारात लेकर निकलता हैं जैसे साक्षात् महाराज अग्रसेन जी की सुशोभित झांकी निकल रही हो। 

5.  इंसान अपने उम्र के हिसाब से काम करता हैं। जब साशन करना था तब राजा बनकर सिंहासन  पर बैठे और जब तप करने की उम्र आई तब राज-पाठ अपने बेटों को सौंप कर तपस्या करने निकल पड़े। 

Retirement कि better policy तो उसी दिन सीखा दी थी महाराज जी ने  जो हम आज भी निभाते हैं। पूरी मेहनत लगाकर हम अपना empire बनाते हैं और जब मेहनत करने की उम्रः ख़त्म हो जाती हैं तब अपने empire की बागदौड अपनी अगली पीढ़ी को सौंप कर धर्म के काममो में लग जाते हैं।

जय अग्रसेन जी ||  


Saturday, July 23, 2022

61. महीना ये सावन का |

महीना ये सावन का और झूम रहा ये मन है 
बेचैन मन को जो शांत करदे, ये मीठी सी वो  हवाएं हैं। 
बचपन को फिर जिलू ये एहसास वो  बारिश बताती हैं 
छपक छपक  कर कूदते, भीगते, हस्ते थे, वो मस्त जिंदगी आज याद आती है। 
महीना ये सावन का सुकुन  दे जाती है। 

महीना ये सावन का और शुद्ध हो रही ये आत्मा हैं 
आश्वस्त से स्वस्थ जीवन, उपवास करना ये सिखाती हैं। 
भक्ति की शक्ति से, ज्योतिर्लिंगों की परिक्रमा ये करवाती है 
बोल-बम के नारों से, ऊर्जा जो भर देती वो तन - मन  हैं। 
महीना ये सावन का शिव-गोरा के प्रेम को दर्शाती हैं। 

महीना ये सावन का और रिश्तों में मिठास भर रही है 
भाई बहन के प्यार को और गहरा वो बना दे रही  है।
हलकी फुल्की नोक झोक से रक्षा का प्रतिक समझा रही हैं 
पार्वती के हाथों बाँधी  डोर नारायण को, वो प्रेम समझा रही हैं। 
महीना ये सावन का भाई बहन को और करीब ला रही हैं। 

महीना ये सावन का और झूला झूल रहे नन्दलाल है 
दही हँडिया फुट रहीं और कृष्णा धुन में झूम रहे लोग है। 
नन्द घर आनंद भायो से अपने घर आनंदमय हो रहे हैँ 
महीना ये सावन का खुशिया बिखेर रहा है। 

महीना ये सावन का और ज्ञान की शक्ति बड़ रही हैं 
चौमासा मना रहे संत और लोग अपनी बुद्धि बड़ा रहे है। 
सेवा- भक्ति हो रहीं हर ओर, आत्मा पवित्र बना रहे हैं 
महीना ये सावन का जीवन सुधार  रहे है। 
महीना ये सावन का जीवन सुधार  रहे है। 








Saturday, June 25, 2022

60. त्राहि त्राहि मचा रहीं ये वसुंधरा ।

त्राहि त्राहि मचा रहीं ये वसुंधरा 
ये काले मेघ  जो आसमान में छा रहा। 
रौद्र  रूप ये भयंकर मेघों का, 
रात-दिन ये धरती को उजाड़  रहा। 

कहीं रास्ते बंद हो रहे, 
तो कहीं वो उच्चे पहाड़ झुक रहे है। 
कहीं खेत उजड़ रहे, 
तो कहीं लोग बेघर हो रहे है। 
कहीं नदियां समुद्र का रूप ले रहीं,  
तो कहीं लोग तिनके की तरह बह रहे हैं । 
ये मेघ काले  नींद-चैन  उजाड़ रहे हैं। 

गरज रहे ये मेघ भयंकर, 
दिल की धड़कन को दहला रहे हैं। 
चमक रही ये बिजली, 
डरावने अँधेरे का एहसास दिला रही हैं। 
ये मेघ काले अपना प्रचंड प्रकोप दिखा रहे हैं।

चारो तरफ ये बरस रहे, 
लोगो कि आस्था को लांग रहे है । 
ये मेघ काले, दाने-दाने को तरसा रहे है।

होंठ यहाँ लोगों के, मिनत्ते मांग रही हैं, 
हाथ जुड़ रहे और सर झुक रहे हैं, 
घुटने तक कर मदत मांगी जा रही हैं।
अपने अपनों को डूबता देख रहे है। 
अपने अपनों को बर्बाद होते देख रहे है। 
ये मेघ काले आत्मविश्वास को मिटा रहे हैं। 

त्राहि त्राहि मचा रहीं ये वसुंधरा। 
हे नटवर नागर ! ये आज तुझे पुकार रही है। 
तोडा घमण्ड इंद्रा का,  बचाया गोकुल को आपने,
रो रो कर मांग रही ये धरती ! शरणागत बस आप से। 
ये प्रचंड प्रकोप मेघो का, 
कब तक तड़पा तड़पा कर मरेंगे हमें। 

त्राहि त्राहि मचा रहीं ये वसुंधरा 
ऐ काले मेघ बसकर, अब तू छट जा !!
बसकर अब तू शांत हो जा।






















Saturday, April 23, 2022

59. INCREDIBLE APRIL....

महीना ये अप्रैल का,सच्च  में अनोखा है। 
नई उमंगों से, नई उम्मीदों से,
नई चाहतो से, नई तरकीबों  से,
भरा पूरा ये माह अप्रैल का…!
हम में नई ऊर्जा का संचार करता है ।

रीति-रिवाजों से, हर्षोल्लास से
नए साल का स्वागत होता है ।
नव वर्ष पूरे विश्व में मनाया जाता है ।

कहीं पर नवरात्रि का शोर है,
तो कहीं रमादान में दुवाओं का जोर है ।
कहीं नन्हें कदमों में नवदुर्गा है,
तो कहीं नमाजों  से खिल उठता ये संसार है ।
महीना ये अप्रैल का सच्च में अनोखा है ।

कहीं राम नवमी में भगवा लहराता है, 
तो कहीं महावीर जयंती पर सत्य का प्रचार होता है।
कहीं राम नाम से नई ऊर्जा का संचार होता है, 
तो कहीं महावीर स्वामी का परचम लहराता है ।
महीना ये अप्रैल का सच्च में अनोखा है ।

कहीं बैशाकी में झूमता ये देश है
तो कहीं बसंत ऋतु का स्वागत खुशियां लाता है। 
कहीं पर खालसा दिवस मनाया जाता है,
तो कहीं खेतो में नई फसलों को उगाया जाता है। 
महीना ये अप्रैल का सच्च में अनोखा है ।

कहीं हनुमान जयंती में नगाड़ों का शोर है
तो कहीं गुड फ्राइडे में , Jesus को याद किया जाता है ।
कहीं पर बजरंग बली का जय कारा लगता है 
तो कहीं Jesus की क़ुरबानी को याद किया जाता है ।
महीना ये अप्रैल का सच्च में अनोखा है ।

कहीं गुड्डी परवा में गले मिलते लोग है,
तो कहीं पिठा से मुंह मीठा करता ये असम है ।
कहीं हंसता मुस्कुराता ये देश हैं,
तो कहीं जिंदगी के नई पाठ सिखते-सिखाते ये लोग महान है ।
महीना ये अप्रैल का सच्च में अनोखा है ।

महीना तो बस यहीं एक है। 
जोड़ता देश को, जोड़ता दिलों को
और तोड़कर भेदभाव को…!!
भुलाकर पिछले मन-मुटाव को ,
बस खुशियां बिखेरता है ।
सच्च  में ये महीना अप्रैल का बहुत अनोखा है ।








Thursday, April 7, 2022

58. झलक कुछ राम की।

इंतज़ार की घड़ी बस खत्म हुई थी,
अयोध्या में खुशियाँ छाई थी। 
राजा दशरथ क्या खूब नाच रहे थे, 
माँ कौशल्या की गोद भर गई थी। 
धरती-अम्बर गद-गद मुस्का रही थी,
राम का जन्म हुआ है , बधाइयाँ ही बधाइयाँ बट  रही थी। 

बाल रूप में नारायण अवतार लिए थे।  
भविष्यवाणी तो हो ही चुकी थी....!!
प्रेरणा करोड़ो  का ये राम बनेगा,
राजा अयोध्या का बनकर, ये तीनों लोकों पर राज करेगा। 
कष्टओ  का जीवन में अम्बार लगेगा......!!
पर समय के अंत तक राम नाम हमेशा अमर रहेगा। 

साधारण से ये राम, बचपन को जीता था। 
साधारण से ये राम, बाल-क्रिड़ाये  करता था। 
राजकुमार राम नहीं, बस राम बनकर ये मन को मोह लेता था, 
सादगी का परिचय राम हर बार देता था। 

धनुष तोड़कर शर्तों की प्रथा तो तोड़ा था,
एक पति-ब्रत का वचन देकर, सीता का मान बढ़ाया था।  
चौदह वर्ष का बनवास हस्ते हस्ते स्वीकार कर लिए था, 
राज सिंघासन को छोड़ काँटों  पर अपना आशियाना सजाया था। 
अंत समय में अपने पिता को देख भी ना पाया था,
सीता के वियोग में पल पल खून के आँसू रोया था।  
पर हर बार राम आपने शांति और सैयाम  का परिचय दिया था । 

लगाया गले उनको, जिनको  समाज ने धित्कारा था, 
जात-पात की बेड़ियाँ  तोड़ी और इंसानियत से सबको जोड़ा  था।  

विनम्र  होकर समुद्र से रास्ता माँगा, 
रात दिन प्रार्थना की,  पर हलचल ना होने पर, 
विशाल समुद्र को अपना प्रकोप दिखाया था । 
राम-सेतु के निर्माण में, छोटी गिलहरी का भी मान बढ़ाया, 
राम आपने तो इंसानो के साथ पशुओं को भी गले से लगाया था। 

ना शक्ति थी, ना सेना थी, ना कोई रथ था और ना था कोई सेनापति,
ना कोई वीर योद्या था, ना थे  कोई भयंकर अस्त्र-सस्त्र। 
और भीड़ गए आप राम उस रावण से जो त्रिलोक का विजेता  था। 

क्रोध से पहले, विनम्रता  रावण से भी की, 
पर ना मानने पर, छिड़ गई वो भयंकर लड़ाई थी। 
खड़ा किया वानरों को सामने उनके,
जिसकी सेना हर युद्ध-कौशल में बेमिशाल थी। 
आत्म विश्वास से लड़े राम, और तोड़ा घमंड 
जो दशानन  में  भर भर के था  कभी। 

सम्मान रावण को भी दिया था , 
भाई लक्ष्मण को वेदों का ज्ञान दिलवाकर। 
विभीषण को लंका का राजा बनाया, 
सह-सम्मान  सीता को वापस लाया था। 
अपनी मर्यादा का परिचय डंके- की- चोट पर  दिया था। 

लहराया परचम भगवा का आसमान में 
और गूंज उठा भूमण्डल, राम के जयकारों से। 
वचन पूरा कर राम पधारे अयोध्या 
और दीप जले थे आंगणो में। 
राजा बने थे राम, हर मुश्किलों से लड़कर,
सिखाया  संसार को,  अगर जिना  है तो होना होगा निडर। 
 
वर्ष बीत गए,  राम कथा अमर हो गई, 
राम नाम से वैकुण्ठ मिले, ये बात दुनिया को समझ आ गई। 
ये बात दुनिया को समझ आ गई।



Monday, March 7, 2022

57. नारी साधारण नहीं..|||

औरत, नारी, महिला..........!!!!! 
तू ना साधारण हैं, साधारण तो बस दुनिया की सोच हैं। 
दबाता था समाज जिसे पग पग पर,
आज वही नारी दुनिया में सबसे आगे हैं। 

क्षेत्र, नाम मैं  किन किन का लूँ, नाम यहाँ अनेक है।  
बताना शुरू करू, तो मेरी ये सांसे भी कम हैं। 
शुक्रिया कैसे अदा मैं करू, मेरे तो ये शब्द भी कम हैं। 

लड़ना इन्हे हर बार अपने हक़ के लिए पड़ता है,
कभी समाज से, कभी अपने परिवार से, तो कभी खुद से।  
पर झुक जाये ! ऐसी कमजोरी  नहीं हैं इनमे। 

सदी ये 21 वी हैं, बदलाव आज बहुत है !!
पर आज भी कसूर हो  या नाहो, सांकेतिक अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ता हैं  इन्हे। 
सफल ये हर परीक्षा में फिर भी होती हैं,
क्युकि ये अपने इरादों से हार नहीं मानती है। 

चार दीवारों की ये बंदिस नहीं,
ये दुनिया से कदम से कदम मिलाती  हैं। 
घर से निकल एक लम्बी उड़ान ये भर्ती हैं। 
उड़ान ऐसी जो दुनिया में इतिहास रचती हैं। 

ख्वाइशे इनकी भी बहुत हैं, बस बेड़िया खुलनी चाहिए, 
दुनिया में अपना परचम फैलाना ये खुद जानती हैं। 

हर औरत दुर्गा हैं, 
हर औरत में महालक्मी हैं। 
हर औरत रानी लक्ष्मीबाई हैं, 
और हर औरत में Mother Marry हैं। 
माहौल चाहें जैसा भी हो 
ये हर माहौल को अपना मानकर खुश रहने की कोशिश करती  हैं। 
अपने परिवार की ढाल बनकर ये हरबार सामने उतरती हैं। 

गवाह है इतिहास और भविष्य भी रचना करेगा ..!! 
नारी साधारण नहीं, साधारण तो बस दुनिया की सोच ही रह जायेगा। 
नारी साधारण नहीं, ये भविष्य चीक-चीक कर बोलेगा। 










Thursday, January 20, 2022

56. The Accidental Friendship

मिलना हमारा शायद एक इतिफाक था,
पर वो इतिफाक सच्च में भयानक था |
जब भी मिले, बस झगड़े
जब भी बात की, टेढ़े बोले 
पर दिल में दोस्ती, हम पक्की वाली, वो हम बनाने लगे। 

वजाह कोई और है, ये सच्च हैं !
पर आज दोस्ती हमारी, उस  वजाह का मोहताज़ नहीं, 
ये तू अच्छे से जानती हैं। 

तू गुवाहाटी आई 
हम कभी कभी मिलने लागे।
हसी-मज़ाक, शरारत-झगडे, सब होने लागे 
पर दोस्ती दिल में खट्टे-मीठे से गहरे हुए। 

एक काला अँधेरा, एक हादसा आया ज़िन्दगी में तेरे,
जिसने झंझोड़ा रूह को तेरे। 
चुना तूने मुझे, और खोले सारे राज़ अपने मनके ।
एक बार लगा क्यों सुन्नु मैं तुझे,
तकलीफ़ तेरी हैं, क्यों मतलब रखु मैं तुझसे,
बस उस वक्त एक ही ख्याल आया मन में मेरे 
तूने अपनी तकलीफ में याद किया मुझे 
इस वक्त कैसे मैं पिछे हतु 
ऐसे संस्कार नहीं हैं मेरे। 

तू रात दिन रोइ मेरे सामने 
सच्च बोलता हूँ, आंसू तेरे देखकर बहुत तकलीफ होती थी मुझे ।
एक घमंडी पूजा के भीतर एक सेंसिटिव पूजा को देखा मेने,
हर वो कोशिस मेने भी कि, 
तुझे तेरे अतीत से बाहर लाने की ।

एक हादसा और जिसने परखा  तेरे हिम्मत को,
पिता को लड़ना पड़ा, सुयं खुदकी जिंदगी से ।
अकेली तूँ, रही, सही बस अपनी तकलीफो को 
समय ने तुझे भी फटकारा , जिस वजाह से 
अकेली तूने  संभाला घर, व्यापार, त्यौहारों को। 

चिंता तेरी हर पल लगी रहती थी मुझे
क्यूंकि कोई अपनी सी लगने लगी थी तू मुझे ।

तेरे उदास चेहरे के बीच जब देखी झलक हसीं की हलकी सी।
अपने phone में capture किया हूँ
उस ख़ूबसूरत पल को। 

 "एक बात कहुँ - तू रोटी हुई बहुत अच्छी लगती हैं"

हर दिन हम झगड़ते ,
Call पर दोस्ती तोड़ने की खोकली धमकी हर बार देते, 
पर असल सच्च बात-
हम एक दूसरे को कुछ बोलने से पहले ना कभी सोचते ।

Mental, psycho, चमार हर कुछ, ना जाने क्या क्या बोलता हूं,
पर Dhinchak Pooja से भी गई-गुजरी है तू ।

ईश्वर से बस एक ही प्राथना में करता हूं,
बचाए भगवान उस इंसान को 
जिसकी जिंदगी तब्हा करेगी तू।

बस चल बहुत कह लिए 
एक बात आखिर में -
तू हस्ती हैं तब लगती है प्यारी बंदरिया सी 
परेशान मत करना मुझे ये return गिफ्ट देदे मुझे अपनी बर्थडे वाली ।
क्युकि cutiepie नहीं, psychopie ही है तू मेरी।





Saturday, January 15, 2022

54. INDIAN ARMY-किसी देवदूत से कम नहीं

ये इंसान नहीं, सच में 
कोई देवदूत ही है। 
उत्साह नहीं, गम नहीं, ख़ुशी नहीं, उदासी नहीं, चिंता नहीं। 
बस अपने फ़र्ज़ के प्रति अटल  रहना,
ये किसी आमं इंसान के बस की बात नहीं।  

जान हथेली पर रखकर,
कुदरत को अपना गुलाम बनाना !
ये हार्ड मांस के बने  इंसानो की इतनी औकात  नहीं। 

डर भी डरे जिनसे,
काल भी आने से पहले घबराये जिनसे,
आँसू बहाये बच्चा बच्चा सहादत पर जिनके ,
INDIAN ARMY कहलाये वो 
खुदा के फरिस्ते  बनके। 

वॉर नहीं करते पहले, ये खालसा गुरु गोविन्द  हैं ।
पर जब वॉर किया किसी और ने 
तब ये रुद्र का अवतार हैं ।

कार्गिल, उरी, पुलवामा जैसे और भी काफी धोके थे ।
पर जब जवाब, सर-जमीन-ऐ-पाक में घुस कर दिया INDIAN ARMY ने, 
त्राहि-त्राहि कर उठा पाक !
घमंड जिसे था अपनी नापाक इरादों में ।

रास्ता ना मिलने पर, अपना रास्ता खुद बनाये 
इरादे इतने बुलंद, जिससे हिमालय भी घबराये 
पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप का अंस, 
वहीं साहस प्रतिपल ये INDIAN ARMY दर्शाये। 

चहरे पर मौत का खौफ नहीं,
अपने ना होने पर, परिवार की कोई चिंता नहीं ।
दुश्मन की लाश को अपना बिस्तर बनाना,
खुले आसमां को अपना छत बनाना।
होली रंगो से नहीं, खून से खेलना ।
दिवाली पटाको से नहीं, बारूद से मानना ।
और तिरंगे की आन के लिए, मिट जाना ।
ये किसी आदमज़ाद के बस की बात नहीं ।

जब कर्फ्यू लगता देश में ,
या होता कोई धार्मिक बवाल ।
अमल-शांति के लिए, उतरते INDIAN ARMY ज़मीन पे ।
हैं ! हिंमत किसी में ! ये CHALLENGE है मेरा,
निकले बहार और पंगा ले इनसे ।

ये INDIAN ARMY हैं, कोई कमजोर दिल इंसानी पुतले नहीं ।
अकेला एक, लाखों पर भारी हैं। 
अकेला एक, लाखों पर भारी हैं।




 



Monday, December 20, 2021

53. इंसान नहीं, राम नहीं, कृष्ण नहीं, भगवान नारायण ही है तू |||

                                                          ऐ  दुनियां की किस्मत लिखने वाले,
तू शायद अपनी ही किस्मत लिखना भूल गया ||
नारायण का अवतार हो कर भी तू ,
स्वयं अपने लिए कांटे बिछा गया ||

जन्म चाहे अयोध्या के राज महल में लिया ,
या मथुरा के कारागार में, 
सुख तो ना पाया कभी, 
अपने ही पुरे जीवन संसार में ||

बड़े बड़े राक्षस  मारे | 
जीत लिए सीता का राज-स्वयंवर | 
राधा ने भी क्या खूब बसाया मन मंदिर में |
प्रेम का अनूठा नाम,
रच गया संसार में,
राधे- श्याम, सीता- राम बनकर। 

जन्म लेते ही अपनी माँ का चेहरा भी न देख पाया | 
एक ही पल में राज-सिंहासन को  त्याग, बनवासी हो गया |
जिस प्रेम की  दुहाई देती है दुनिया ! 
उसी वियोग में क्यों सीता से दूर होकर कठोर बन गया ?
और वहीं राधा को अपने मन में बसाकर,  
पल पल खून के आंसू रोया ||

ऐ   दुनियां की किस्मत लिखने वाले !! 
तू अपनी हीं किस्मत, काँटों से बिछा गया | 
अंत समय में अपने पिता को कांधा भी ना दे पाया |
राजा होकर भी तू, एक झोपडी में अपना संसार बसाया। 

जिस रावण के अहंकार  से धड़क उठा था भूमण्डल,
सीता का अपहरण कर, जिसने रुलाया तेरा मन, 
क्यों रचा युद्ध का इतना बड़ा आडम्बर ? 
जब शक्ति सिर्फ तुझमे थीं !!
रावण का अंत कर, पल में सीता को अपने पास बुलाकर। 

क्यों गोकुल में राक्षसों का आतंक  मचवाया ? 
कंस का अंत, तो सिर्फ, तेरे ही हाथों  था  लिखा गया ।

मर्यादा पुरुषोत्तम होकर भी प्रजा ने आरोप लगाया | 
सूर्यवंश कि कीर्ति बचाने के लिए,
बिन जाने अपने बेटो से ही युद्ध में भिड़ गया। 

भरी सभा में स्त्री के सम्मान में 
साडी का सेहलब ला दिया | 
भरी सभा में भाई सिसुपाल के कटु शब्द सहे, 
वचन जो तूने दिया अपनी भुआ को, १०० गलतिया भुलाकर |

धर्म की स्थापना के लिए, शस्त्र को त्यागा ,
भगवत गीता के जरिये दुनिया को रास्ता दिखाया |
महाभारत ने बदल दिया रुख, हवा का दुनिया से ,
पर अंत में गान्धारी के कड़वे  श्राप को भी हस्ते हस्ते स्वीकारा ।। 

कहाँ थी वो शक्ति धनुष-बाण की ! 
कहाँ थी शक्ति सुदर्शन चक्र की !
क्यों सहा तूने, स्वयं नारायण का रूप है तू |

तकलीफो को सहकर भी कैसे मुस्कुरा था तू ?
हर परिस्थिति में शांत कैसे रहता था तू ?
दे दे वरदान शांति का !!!
आखिर में इंसान नहीं,  राम नहीं, कृष्ण नहीं !!
भगवान नारायण ही है तू |||


                                     
















Saturday, November 27, 2021

52. SPEAK YOUR WORDS WISELY...

ऐै  बन्दे....!!! 
शब्द अपने संभाल कर बोल। 
ये तेरे  शब्द ही हैं, जो तुझे बनाएंगे, 
ये तेरे शब्द ही हैं, जो तुझे तोड़ेंगे, 
ये तेरे शब्द ही हैं, जो तेरी असली पहचान बनाएंगे। 

तू मालिक हैं...!
शब्द तेरे, तेरे कर्मचारियों  में आत्म्विश्वास  बढ़ाएंगे। 
तू पिता हैं...!
शब्द तेरे, तेरे बच्चों की हिम्मत बढ़ाएंगे। 
तू जहां रहता हैं..!
शब्द तेरे, वो वातावरण को बनाएंगे। 
ऐै बन्दे....!
शब्द अपने संभाल कर बोल,
ये तेरे शब्द ही है जो तुझे एक इंसान बनाएंगे।

ये जुबान  पर आए शब्द ही थे,
जिस वजह से शिशुपाल ने अपना सर गंवाया। 
ये जुबान पर आए शब्द ही थे,
जिस वजह से रामायण में भाई को भाई से ही दूर करवाया।
और ये जुबान पर आए किसी के शब्द ही थे,
जिसने वाल्मिकी को साधू बनाया।
ये जुबान पर आए बुद्ध  के शब्द ही थे,
जिसने उंगलीमल जैसे राक्षस को भी इंसान बनाया।
ऐै बन्दे....!! 
ये तेरे शब्द ही है, जो तेरी जिंदगी बनाएंगे।

तू चाहे तो थप्पड़ खींच के मार,
तू चाहे तो कर लातों की बौछार,
पर शब्द ना बोल ऐसे जो 
जख्म  दे हजार।

शायद वो तुझे कुछ ना बोलेगा,
पर ऊपर देख उस रब से वो शिकायत करेगा।

अपने शब्द से जो तू बोएगा
फल उसी का जो पायेगा
वहीं तेरा भविष्य बनाएगा ।

ऐै बन्दे 
शब्द अपने संभाल कर बोल ।

ऐै बन्दे 
शब्द अपने संभाल कर बोल ।







Saturday, September 18, 2021

51. मैं जैन तो नहीं , पर......?


मैं जैन तो नहीं पर.... 
जैन धर्म के आगे सर  झुकाता हूँ। 
अपनी आत्मा तो पवित्र करना 
मैं किसी और से नहीं 
बस जैन धर्म से सीखता हूँ। 

दसलक्षण जैसे पवित्र त्यौहार से 
मैं अपने खुद को पहचानना सीखता हूँ। 
दुनिया से परेह होकर 
मैं अपने खुदकी शक्तियों को पहचानना सीखता हूँ। 
मैं जैन तो नहीं पर....
जैन धर्म से मैं बहुत कुछ सीखता हूँ। 

किसी को आसानी से माफ़ कर देना और खुद माफ़ी भी मांगना ,
अपने दरिया दिल से चिंताओं के बवंडर को दूर करना,
अपनी सोच को सुधारकर सत्य की राह में चलना 
अपनी ज्ञान की शक्ति से खुदकी राह खुद बनाना , 
इन्ही लक्षणों से मैं आगे बढ़ने की प्रेरणा लेता हूँ। 

संयम से मैं तप को धारण करता हूँ,
सब मोह-माया से दूर 
एक नई सुबह कि सुरुवात मैं करता हूँ।  

अपने मन के भावों को त्याग कर 
मैं औरो  को सम्मान देना सीखता हूँ। 
मैं खुदसे खुदको पहचानना सीखता हूँ। 

मैं जैन तो नहीं पर...
जैन धर्म से मैं जिना सीखता हूँ।


Thursday, September 9, 2021

50.बप्पा तुझसे शिकायते बहुत हैं |

बप्पा !!!
तू विघ्नहर्ता  कहलाता हैं, 
पर मेरे विघ्न  क्यों नहीं हरता हैं? 
यू मूर्ति बनकर बैठा है,
सुनकर भी मेरी बाते अनसुना कर रहा हैं। 
बप्पा !!! 
तू विघ्नहर्ता कहलाता हैं। 

तू देवों में सबसे निराला है, 
प्रथम पूज्य का सम्मान तुझे मिला हैं। 
मंगल कार्य की मंगल मूर्ति तू बना हैं,
गजानन, विनायक अनेको नाम से तू जाना गया हैं। 
फिर क्यों बाप्पा !!
आज तू मुझे देख मौन बैठा हैं ?

जिम्मेदारी निभाते-निभाते अपना मुख समर्पित कर दिया,
जिम्मेदारी निभाते-निभाते अपना एक दन्त खो दिया, 
कुछ खोकर भी तू गजमुख विनायक बन गया। 
उस टूटे दन्त से महाभारत रच दिया। 
अब क्या सजा दू तुझे,  बप्पा   !!
तू बस मेरी जिम्मेदारी ही ढंग से ना निभा पाया। 

हाँ !! तुझसे शिकायत मैं बहुत रखता हूँ 
क्यूंकि पिता-भाई-दोस्त तुझे सब कुछ मैं  मानता हूँ 
फिर भी  बप्पा   तेरा स्वागत मैं ढोल- नगाड़े से करता हूँ। 
और वहीं तेरे जाने पर 
पलके झुकाये, तुझे बिदा करता हूँ। 

सुखकर्ता दुखहर्ता तू कहलाता हैं, 
तेरे भक्तो कि भिड़ में शायद मैं ही कहीं खो गया हूँ। 
तू हैं, इसका एहसास हैं मुझे 
पर तू मेरे साथ हैं, ये विश्वास कब होगा मुझे ?

बिन मांगे भी बहुत कुछ दिया हैं,
बस कुछ शिकायतें हैं तुझसे, 
क्युकि डरता नहीं, प्यार है तुझसे। 
तू बस साथ रहना 
यही प्रार्थना हैं  बप्पा   तुझसे। 











 



Friday, August 20, 2021

49. Younger Age With INCREDIBLE Thoughts

Just yesterday, I bowed before the wisdom of a small girl.

I went to a program yesterday where class-10 pass-out students were being felicitated this year. I saw all the children looking at each other and touching the feet of all those who were felicitating them and those who were sitting on the stage.

In the crowd of those 30-35 children, there was a girl, 15 years of age who touched the feet of all the people sitting on the stage except the person who felicitated  her. Instead of touching his feet, the girl choosed to shake hands. I didn’t understand why she did this? Where everyone was touching feet, why didn't she do what everyone else was doing?

This is a option, I accept but I wanted to know what thought-process was going over her mind at that moment.

After the program was over, I could not stop myself and asked the girl why she do this.

That girl's answer bowed me before her age and age's wisdom.

The girl replied me, "The one who felicitated me is of my brother's age and the rest of the people who were sitting on the stage are of my father's age. If I touched the feet of the one who is of my brother's age, he would have felt awkward.  And somewhere other people who were sitting here would also have made fun of him which I didn't wanted. I don't want those who felicitated me over my success to have less respect than mine."

The great thinking of that girl's young age made me realize that this girl cannot be a part of any crowd. In the open sky, she will fly with her wings planted. Its wisdom will take it a long way.





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(HINDI TRANSLATION)

बस कल ही की बात, एक छोटी सी बच्ची की समझदारी के सामने मैं  नतमस्तक हो गया। 

मैं कल एक program में गया था जहां इस साल Class-10  के pass-out students को felicitate किया जा रहा था।  मैने देखा की सभी बच्चे एक दूसरे के देखा-देखी उन सभी के पैर छू रहे थे जो उन्हें felicitate कर रहे थे और जो स्टेज पर बैठे थे। 

उन 30-35 बच्चों की भीड़ में एक 15 साल की लड़की ऐसी थी जिसने उस इंसान  को जिसने उसे  felicitate किया, को छोड़कर स्टेज में बैठे बाकि सभी लोगों के पैर छुवे। उसके पैर छूने के बजाय , उस लड़की ने  हाथ मिलाना चुना। मुझे ये नहीं समझ आया कि उसने ऐसा क्यों किया। जब सब पैर छू रहे थे तब उसने वो क्यों नहीं किया जो हर कोई कर रहे थे। 

ये एक option हैं, मैं इसे मानता हूँ, पर मैं ये जानना चाहता था कि उस समय उसके दिमाग में क्या thought-process चल रहीं था। 

Program खत्म होने के बाद मुझसे रहा नहीं गया और मैने उस लड़की को पूछ लिया कि उसने ऐसा क्यों  किया। 

उस लड़की के जवाब ने मुझे अपने उम्र और उम्रः के समझदारी के सामने झुका दिया।  

उस लड़की ने मुझे ये जवाब दिया  "जिसने मुझे Felicitate किया वो मेरे भाई की उम्र का हैं और बाकि जो लोग स्टेज पर बैठे थे वो मेरे पापा के उम्र के हैं।  अगर मेँ अपने भाई के उम्र वाले के पैर छूती तो उन्हें awkward feel होता और कहीं ना कहीं  बाकि लोग जो यहाँ बैठे थे वो उनका मजाक बनाते जो मैं नहीं चाहती थीं। जिसने मुझे felicitate किया उनका सन्मान मेरी बजाह से कम हो ये मैं नहीं चाहती। "

उस  बच्ची की छोटी उम्र कि  बड़ी सोच ने मुझे ये एहसास दिलाया कि ये लड़की किसी भीड़ का हिस्सा नहीं बन सकती।  खुले आसमान में ये अपने लगाए पंखों के साथ उड़ेगी।  इसकी समझदारी इसे बहुत आगे तक ले जाएगी।



 

Sunday, July 11, 2021

48. हम लड़के हैं पर Pressure Cooker नहीं

हम लड़के हैं पर Pressure Cooker नहीं। 
चेहरे से सक्त दिखते हैं, 
पर दिल में sensitivity कूट कूट कर भरी हैं कहीं ना कहीं। 

बचपन से यही सिखाया जाता हैं, 
परिवार का नाम रोशन करना हैं !
सब तुम्हे ही संभालना हैं !
पैसे भरपूर कामना हैं !
पर खुदको सँभालने में चूक जाते हैं हम कभी कभी। 
जी हाँ  हम लड़के हैं पर Pressure Cooker नहीं।

घर की Financial Problem हो 
या जैसा भी हो Health Condition | 
रिश्तेदारों के ताने हो 
या Girl Friend का rejection | 
हर situation पर bold रहना हैं, 
यही होता है हमारा Call-for-action | 
जी हाँ  हम लड़के हैं पर Pressure Cooker नहीं।

जिम्मेदारियों का क्या कहे- 
चार दिन की trip हो 
या Fracture हाथों पर हो। 
दिल से बेचैन हो 
या चाहने वाले से तकरार हो। 
चेहरे पर शिकंज भी नहीं ला सकते हम ,
चाहकर  एक दिन भी नहीं रुक सकते हम ,
चलते रहना हैं चाहे ख़ुशी हो या गम। 
जी हाँ  हम लड़के हैं पर Pressure Cooker नहीं।

उम्र 25 की जब हमारी आती हैं, 
खतरे की घंटी अब बजना शुरू हो जाती हैं। 
कई सारे ख्याल रातों में सोने नहीं देते! 
एक ओर शादी का Pressure,
दूसरी ओर career का tension 
एक ओर family की Social Standing का Pressure, 
दूसरी ओर अपने यारों से दूर हो जाने का गम 
इन सबको सँभालते सँभालते 
काफी बदनाम हो जाते हम। 
जी हाँ  हम लड़के हैं पर Pressure Cooker नहीं।

Success को हमारी किस्मत का खेल कहाँ जाता हैं, 
Failure पर हमारी गलतियों से नवाजा जाता है। 
अकेलेपन, Anxiety का शिकार हम भी हैं, 
पर क्या करे हम दिखाते नहीं हैं। 
जी हाँ  हम लड़के हैं पर Pressure Cooker नहीं।

हमे संभालना भी आता हैं, 
हमे संभलना भी आता हैं, 
जी हाँ  हम लड़के हैं पर Pressure Cooker नहीं।






Monday, June 14, 2021

47. कुछ परिवर्तन मुम्किन होते है

"कहते है जब दिलो में नफरत की जुवला इस कदर बढ़ जाती है कि किसी की भी फटकार, या सलाह, या तर्कीव उस नफरत कि आग को ठंडा नहीं कर सकती तब कोई Positive शक्ति, कोई दैविक शक्ति ही उस नफरत की जुवला को ठंडा कर सकती है।"

 मैंने इस Positive शक्ति को शाक्षात महसूस किया है। 

 गत कुछ सालों से मेरे चाचा और हमारे परिवार के बिच कई घरेलु मामलो को लेकर बात-विवाद चल रहा है। इन घरेलु मामलो को लेकर हम दोनों परिवारों में एक नफरत सा माहौल दिलो पर छाया हुआ था।  ये नफरत इस कदर थी कि  दोनों परिवार एक दूसरे को देखना तो दूर, एक दूसरे का नाम भी पसंद नहीं करते थे। इस नफरत ने पुरे परिवार को, सारे रिस्तेदारो को भी एक दूसरे से दूर कर दिया था।

और कहीं ना कहीं ये नफरत मेरे मन में भी अपने चाचा के लिए पल रही थी जिसे मिटाना शायद आसान नहीं था। मेरे मन में मेरे चाचा के प्रति नफरत, गुस्सा दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही चला जा  रहा था। छोटे- बड़े का सम्मान बिल्कुल खत्म हो चूका था। 

एक घटना ने मेरे मन से 13 साल पुराने पलते नफरत को एक ही झटके में खत्म कर दिया। 

गत कुछ दिनों पहले मेरे चाचा और उनका पूरा परिवार कोरोना से संक्रमित  थे । चाचा समेत सब परिवार अपने घर में isolate हो चुके थे। मेरे पापा रोज चाचा से उनके और  उनके परिवार के स्वस्त की खबर लेते जरूर थे पर मेरे मन में कोई चिंता नहीं थी। कुछ दिंनो बाद मेरी चाची की तबियत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ गई , यहाँ तक की hospital में admit करने की नौबत आ गई। चाचा, चाची को Guwahati, Health City Hospital में admit कैरवाने ले जा रहे थे।  मुझे जैसे ही ये खबर पता चली, मेने सबसे पहले अपने पापा को जाकर ये बताई।  मेरे पापा ने चाचा से पूछा अगर मेरी जरुरत है तो मुझे साथ ले जाने  जिसपर मेरे चाचा ने मना कर दिया। 

शायद उसी वक्त ईस्वर ने इशारा दे दिया था कि यही वक्त हैं अपने फ़र्ज़ को निभाने का । एक ही  मिनट में बहुत सारे सवाल  मन को परेशान कर रहे थे कि चाचा और चाची दोनों कोरोना संक्रमित हैं तो इस हालात में कैसे चाचा hospital की formalities पूरी कर पायेगा?, कौन उनके पास रहेगा?, वो कैसे चाची का ख्याल रख पायेगा?, कहीं चाचा के कुछ हो गया तो क्या होगा ? इन सभी सवालो का जवाब उस वक्त मुझे सिर्फ एक ही नज़र आ रहा था कि मुझे इसके साथ जाना होगा। 

बिना दिल में कोई शिकायत रखे मैने चाचा  से बात कि जिसपर वो मुझे साथ चलने  से मना करने लगे पर उस वक्त शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था। PPE KIT पहनकर, ईस्वर का नाम लेकर मैं चाचा-चाची से साथ Ambulance में Guwahati जाने को तैयार हो गया।  उस वक्त से लेकर Hospital में रहने के आखरी दिन तक मेरे मन में एक बार भी ये ख्याल नहीं आया कि हमारा पारिवारिक वैर चल रहा है। मेरे से जो और जितना अच्छा हो सका मैंने वो सब किया। हर वो कोशिश कि जिस से चाचा और चाची को कोई तकलीफ़ ना हो। 

ये 6  दिनों में बदलाव के नाम पर बहुत कुछ हुए। चाचा और मैं अपने मनभेद को छोड़कर वापस अच्छे से बात करने लगे, एक दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान के भाव वापस नज़र आने लगे, पुराने झगड़े के किसी भी बातों का जिक्र नहीं हुआ, क़रीबी रिश्तेदारों के साथ सम्बंद वापस सुधरने लगे, दिलों की नफ़रत खत्म होती नज़र आने लगी, निस्फिकर होकर एक दूसरे के प्रति विश्वास वापस मेहसूस होने लगे। 

ये वो बदलाव हैं जो शायद होना नामुमकिन सा था। ये और कुछ नहीं एक दैविक शक्ति ही थी जिसने सालों की नफरत को बिना किसी  फटकार के साथ प्यार में बदल दिया। ये वो दैविक शक्ति ही थी जिसने मुझे Guwahati जानने पर मजबूर कर दिया था।  ये वो दैविक शक्ति ही थी जिसने दिलों को परिवर्तित कर दिया। 

ये परिवर्तन अच्छा हैं। 







Wednesday, May 12, 2021

46. My Sea of Dreams.


ऐ ख्वाब !! तू दरिया है मेरे मन का। 
सोचता हूँ जितना तेरे बारे में,
उतना ही गहरा मेरा मन होता चला जाता। 
ऐ ख्वाब !!तू दरिया है मेरे मन का। 

कोशिशों की कस्ती में बैठकर, 
एक किनारे पर अपना लक्ष साद कर, 
चल पड़ा मैं, ऐ ख्वाब !
तुझे  लांघने !
अपने जान की बाज़ी लगाकर। 

कोशिशों की कस्ती जब पहुंची बीच मझधार  पर, 
चारो तरफ मैं अकेला, उस विशाल दरिया पर, 
हवाएं इस कदर चल रही थी, मेरे मन को चीरकर ,
लगा गिर जायूँगा बस लोगों में एक  उम्मीद बनकर। 

ना थी कस्ती चलाने की  समझ, बस चला रहा था। 
गिर जायु दरिया पर, तो ना तैर पाना जानता था। 
रुक जायु तो पता नहीं किस ओर  जाना  था। 
बस चलता था, ऐ  ख्वाब !
क्युकि मुझे तुझे लांघना  था। 


कसर नहीं छोड़ी मुझे झुकाने की. 
कसर नहीं छोड़ी मुझे डराने की. 
कसर नहीं छोड़ी मुझे वापस लौटाने की.
पर शायद मेरा विश्वास तेरे विशाल काये से बड़ा था। 
झुका नहीं, डरा नहीं, वापस लौटा नहीं,
बस आगे बढ़ता गया जबतक वो किनारा आया नहीं। 

अब वो दिन भी आया. 
मेरी कोशिशों की कस्ती को वो किनारा मिल गया। 
ऐ   ख्वाब !! मैं तुझे लाँघ आया, 
दरिया होकर भी तू मुझे रोक न पाया। 

ऐ ख्वाब, तू दरिया है मेरे मन का। 
सोचता हूँ जितना तेरे बारे में,
उतना ही गहरा मेरा मन होता चला जाता। 
ऐ ख्वाब !! तू दरिया है मेरे मन का।