I am a Writer, a Speaker too. I usually write upon real life facts and I share my writings upon this platform which can touch the reality going on in anyone's life. I also provide suggestions upon improvement of thought process of a normal person
Thursday, January 1, 2026
66. दादी मेरी परम धाम चली गई ।
Wednesday, August 20, 2025
65. दादी सब जानती है।
Wednesday, August 30, 2023
64. भाव भरी श्रद्धांजलि ||
Wednesday, September 28, 2022
63. नारी साधारण नहीं ||
Monday, September 26, 2022
62. Be Proud !!!! "You are a Agarwal"
कहते है कि किसी भी समाज का धरोहर उसका इतिहास होता हैं। और अग्रवंश का इतिहास हर एक अग्रवाल को गर्व मेहसूस करवाता हैं।
अग्रवाल वंश के राजा महाराज अग्रसेन जी ने 5900 साल पहले ही अग्रवाल समाज के भविष्य कि परिकल्पना कर ली थी। ये 5 बातें जो आज मैं यहाँ लिख रहा हूँ, आपको एक अग्रवाल होने पर गर्व मेहसूस करवाएगा।
1. महाराज अग्रसेन ने एक ईंट - एक रुपया की प्रथा शुरू करवाई थी जिसका मतलब हैं कि कोई भी जब अग्रोहा में बसने आता था तो अग्रोहा शहर के हर घर से उस इंसान को एक ईंट और एक रुपया दिया जाता था। एक ईंट इसलिए ताकि वो एक-एक ईंट से अपना घर बना सके और एक रुपया इसलिए ताकि एक-एक रुपया जमा कर वो नया व्यापार कर सके।
यहाँ महाराज अग्रसेन जी ने 2 बाते सिखाई। पहली Teamwork, अगर लोगो का साथ मिलता रहा तो हर कोई कामयाब हो सकता हैं। दूसरा Business Development, महाराज अग्रसेन जी से व्यापार को बढ़ावा दिया नाकि नौकरी को।
इसलिए कोई भी अग्रवाल ज्यादा दिन तक किसी कि नौकरी नहीं कर सकता। देर-सवेर ही सही पर व्यापार तो करेगा ही। व्यापार खून में जो दाल दिया था इन्होने।
2. एक दिन महाराज अग्रसेन की सभा चल रही थी कि महाराज के मंत्री ने हिचकीचाते हुए महाराज से कहाँ -"महाराज आपके पिताजी का एक सपना था जो आपने अभी तक पूरा नहीं किया।"
महाराज भी आश्चर्य से पूछे कि ऐसा कौनसा अधूरा सपना हैं उनके पिताजी का जिसे अभी तक वो पूरा नहीं कर पाये
मंत्री ने जवाब दिया कि उनके पिताजी चाहते थे कि अग्रोहा में एक भव्य महल का निर्माण हो जिसमे हर एक सुख-सुविधा मौजूद हों।
महाराज ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया की महल उनके पिताजी का सीर्फ एक सपना था, ज़िद नहीं। महाराज अपना धन महल बनाने में खर्च नहीं करना चाहते थे जो आने वाले समय में सीर्फ लोगो के मनोरंजन का ही पात्र रहेगा और किसी को इस से कोई फ़ायदा नहीं होगा। इसके बदले महाराज अपना धन व्यापार, कला, में लगाना ज्यादा जरुरी समझा जिससे आने वाले समय में लोगो का और साथ ही साथ समाज का भी भला होगा। हर किसी का लाभ होगा।
Investment की better strategy की निभ तो उसी दिन रख दी गई थी। आज भी जब अग्रवाल invest करता है तो आने वाले लम्बे समय तक का लाभ पहले ही अंकित कर लेता है।
3. महाराज अग्रसेन ने माँ लक्मी की कड़ी तपस्या कि थीं जिससे फल स्वरुप उन्हें ये वरदान मिला कि माँ लक्मी अग्रवंश की कुल देवी कहलाएगी। सुख और समृद्धि हमेसा अग्रवंश में रहेगी।
इसलिए हालात चाहे जैसे भी हो पर हर अग्रवाल अपने मेहनत कि रोटी खुद कमाता हैं। रास्ते में चलते हर एक अग्रवाल को देखकर यही लगता हैं कि बंदा अच्छे पैसे वाले और संस्कारी घर से हैं।
4. हमारे राजा-महाराजा छत्रिया हुआ करते थे पर महाराज अग्रसेन जन्म से एक बैसि जाती के थे। एक बैसि जाती के होने के बावजूद अपनी सूद -बुद और बहादुरी के कारण छत्रिया होने का सम्मान मिला और चवर, छत्र, तलवार धारण करने का सम्मान मिला।
इसलिए जब घर में शादी होती हैं तब दूल्हे को इस कदर सजाया जाता है - सर पे किलंगी, ऊपर छत्र और कमर पे तलवार धारण कर इसकदर बारात लेकर निकलता हैं जैसे साक्षात् महाराज अग्रसेन जी की सुशोभित झांकी निकल रही हो।
5. इंसान अपने उम्र के हिसाब से काम करता हैं। जब साशन करना था तब राजा बनकर सिंहासन पर बैठे और जब तप करने की उम्र आई तब राज-पाठ अपने बेटों को सौंप कर तपस्या करने निकल पड़े।
Retirement कि better policy तो उसी दिन सीखा दी थी महाराज जी ने जो हम आज भी निभाते हैं। पूरी मेहनत लगाकर हम अपना empire बनाते हैं और जब मेहनत करने की उम्रः ख़त्म हो जाती हैं तब अपने empire की बागदौड अपनी अगली पीढ़ी को सौंप कर धर्म के काममो में लग जाते हैं।
जय अग्रसेन जी ||
Saturday, July 23, 2022
61. महीना ये सावन का |
बेचैन मन को जो शांत करदे, ये मीठी सी वो हवाएं हैं।
बचपन को फिर जिलू ये एहसास वो बारिश बताती हैं
छपक छपक कर कूदते, भीगते, हस्ते थे, वो मस्त जिंदगी आज याद आती है।
महीना ये सावन का सुकुन दे जाती है।
Saturday, June 25, 2022
60. त्राहि त्राहि मचा रहीं ये वसुंधरा ।
Saturday, April 23, 2022
59. INCREDIBLE APRIL....
Thursday, April 7, 2022
58. झलक कुछ राम की।
Monday, March 7, 2022
57. नारी साधारण नहीं..|||
तू ना साधारण हैं, साधारण तो बस दुनिया की सोच हैं।
Thursday, January 20, 2022
56. The Accidental Friendship
Saturday, January 15, 2022
54. INDIAN ARMY-किसी देवदूत से कम नहीं
Monday, December 20, 2021
53. इंसान नहीं, राम नहीं, कृष्ण नहीं, भगवान नारायण ही है तू |||
Saturday, November 27, 2021
52. SPEAK YOUR WORDS WISELY...
Saturday, September 18, 2021
51. मैं जैन तो नहीं , पर......?
Thursday, September 9, 2021
50.बप्पा तुझसे शिकायते बहुत हैं |
Friday, August 20, 2021
49. Younger Age With INCREDIBLE Thoughts
Just yesterday, I bowed before
the wisdom of a small girl.
I went to a program yesterday
where class-10 pass-out students were being felicitated this year.
I saw all the children looking at each other and touching the feet of all those
who were felicitating them and those who were sitting on the stage.
In the crowd of those 30-35
children, there was a girl, 15 years of age who touched the feet of all the people sitting on
the stage except the person who felicitated her. Instead of touching his feet, the girl choosed
to shake hands. I didn’t understand why she did this? Where everyone was
touching feet, why didn't she do what everyone else was doing?
This is a option, I accept but I wanted to know what thought-process was going over her mind at that moment.
After the program was over, I
could not stop myself and asked the girl why she do this.
That girl's answer bowed me before
her age and age's wisdom.
The girl replied me, "The
one who felicitated me is of my brother's age and the rest of the people who
were sitting on the stage are of my father's age. If I touched the feet of the
one who is of my brother's age, he would have felt awkward. And somewhere other people who were sitting
here would also have made fun of him which I
didn't wanted. I don't want those who felicitated me over my success to have less respect than
mine."
The great thinking of that girl's young age made me realize that this girl cannot be a part of any crowd. In the open sky, she will fly with her wings planted. Its wisdom will take it a long way.
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(HINDI TRANSLATION)
बस कल ही की बात, एक छोटी सी बच्ची की समझदारी के सामने मैं नतमस्तक हो गया।
मैं कल एक program में गया था जहां इस साल Class-10 के pass-out students को felicitate किया जा रहा था। मैने देखा की सभी बच्चे एक दूसरे के देखा-देखी उन सभी के पैर छू रहे थे जो उन्हें felicitate कर रहे थे और जो स्टेज पर बैठे थे।
उन 30-35 बच्चों की भीड़ में एक 15 साल की लड़की ऐसी थी जिसने उस इंसान को जिसने उसे felicitate किया, को छोड़कर स्टेज में बैठे बाकि सभी लोगों के पैर छुवे। उसके पैर छूने के बजाय , उस लड़की ने हाथ मिलाना चुना। मुझे ये नहीं समझ आया कि उसने ऐसा क्यों किया। जब सब पैर छू रहे थे तब उसने वो क्यों नहीं किया जो हर कोई कर रहे थे।
ये एक option हैं, मैं इसे मानता हूँ, पर मैं ये जानना चाहता था कि उस समय उसके दिमाग में क्या thought-process चल रहीं था।
Program खत्म होने के बाद मुझसे रहा नहीं गया और मैने उस लड़की को पूछ लिया कि उसने ऐसा क्यों किया।
उस लड़की के जवाब ने मुझे अपने उम्र और उम्रः के समझदारी के सामने झुका दिया।
उस लड़की ने मुझे ये जवाब दिया "जिसने मुझे Felicitate किया वो मेरे भाई की उम्र का हैं और बाकि जो लोग स्टेज पर बैठे थे वो मेरे पापा के उम्र के हैं। अगर मेँ अपने भाई के उम्र वाले के पैर छूती तो उन्हें awkward feel होता और कहीं ना कहीं बाकि लोग जो यहाँ बैठे थे वो उनका मजाक बनाते जो मैं नहीं चाहती थीं। जिसने मुझे felicitate किया उनका सन्मान मेरी बजाह से कम हो ये मैं नहीं चाहती। "
उस बच्ची की छोटी उम्र कि बड़ी सोच ने मुझे ये एहसास दिलाया कि ये लड़की किसी भीड़ का हिस्सा नहीं बन सकती। खुले आसमान में ये अपने लगाए पंखों के साथ उड़ेगी। इसकी समझदारी इसे बहुत आगे तक ले जाएगी।
Sunday, July 11, 2021
48. हम लड़के हैं पर Pressure Cooker नहीं
चेहरे से सक्त दिखते हैं,
पर दिल में sensitivity कूट कूट कर भरी हैं कहीं ना कहीं।
परिवार का नाम रोशन करना हैं !
सब तुम्हे ही संभालना हैं !
पैसे भरपूर कामना हैं !
पर खुदको सँभालने में चूक जाते हैं हम कभी कभी।
Monday, June 14, 2021
47. कुछ परिवर्तन मुम्किन होते है
"कहते है जब दिलो में नफरत की जुवला इस कदर बढ़ जाती है कि किसी की भी फटकार, या सलाह, या तर्कीव उस नफरत कि आग को ठंडा नहीं कर सकती तब कोई Positive शक्ति, कोई दैविक शक्ति ही उस नफरत की जुवला को ठंडा कर सकती है।"
मैंने इस Positive शक्ति को शाक्षात महसूस किया है।
गत कुछ सालों से मेरे चाचा और हमारे परिवार के बिच कई घरेलु मामलो को लेकर बात-विवाद चल रहा है। इन घरेलु मामलो को लेकर हम दोनों परिवारों में एक नफरत सा माहौल दिलो पर छाया हुआ था। ये नफरत इस कदर थी कि दोनों परिवार एक दूसरे को देखना तो दूर, एक दूसरे का नाम भी पसंद नहीं करते थे। इस नफरत ने पुरे परिवार को, सारे रिस्तेदारो को भी एक दूसरे से दूर कर दिया था।
और कहीं ना कहीं ये नफरत मेरे मन में भी अपने चाचा के लिए पल रही थी जिसे मिटाना शायद आसान नहीं था। मेरे मन में मेरे चाचा के प्रति नफरत, गुस्सा दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही चला जा रहा था। छोटे- बड़े का सम्मान बिल्कुल खत्म हो चूका था।
एक घटना ने मेरे मन से 13 साल पुराने पलते नफरत को एक ही झटके में खत्म कर दिया।
गत कुछ दिनों पहले मेरे चाचा और उनका पूरा परिवार कोरोना से संक्रमित थे । चाचा समेत सब परिवार अपने घर में isolate हो चुके थे। मेरे पापा रोज चाचा से उनके और उनके परिवार के स्वस्त की खबर लेते जरूर थे पर मेरे मन में कोई चिंता नहीं थी। कुछ दिंनो बाद मेरी चाची की तबियत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ गई , यहाँ तक की hospital में admit करने की नौबत आ गई। चाचा, चाची को Guwahati, Health City Hospital में admit कैरवाने ले जा रहे थे। मुझे जैसे ही ये खबर पता चली, मेने सबसे पहले अपने पापा को जाकर ये बताई। मेरे पापा ने चाचा से पूछा अगर मेरी जरुरत है तो मुझे साथ ले जाने जिसपर मेरे चाचा ने मना कर दिया।
शायद उसी वक्त ईस्वर ने इशारा दे दिया था कि यही वक्त हैं अपने फ़र्ज़ को निभाने का । एक ही मिनट में बहुत सारे सवाल मन को परेशान कर रहे थे कि चाचा और चाची दोनों कोरोना संक्रमित हैं तो इस हालात में कैसे चाचा hospital की formalities पूरी कर पायेगा?, कौन उनके पास रहेगा?, वो कैसे चाची का ख्याल रख पायेगा?, कहीं चाचा के कुछ हो गया तो क्या होगा ? इन सभी सवालो का जवाब उस वक्त मुझे सिर्फ एक ही नज़र आ रहा था कि मुझे इसके साथ जाना होगा।
बिना दिल में कोई शिकायत रखे मैने चाचा से बात कि जिसपर वो मुझे साथ चलने से मना करने लगे पर उस वक्त शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था। PPE KIT पहनकर, ईस्वर का नाम लेकर मैं चाचा-चाची से साथ Ambulance में Guwahati जाने को तैयार हो गया। उस वक्त से लेकर Hospital में रहने के आखरी दिन तक मेरे मन में एक बार भी ये ख्याल नहीं आया कि हमारा पारिवारिक वैर चल रहा है। मेरे से जो और जितना अच्छा हो सका मैंने वो सब किया। हर वो कोशिश कि जिस से चाचा और चाची को कोई तकलीफ़ ना हो।
ये 6 दिनों में बदलाव के नाम पर बहुत कुछ हुए। चाचा और मैं अपने मनभेद को छोड़कर वापस अच्छे से बात करने लगे, एक दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान के भाव वापस नज़र आने लगे, पुराने झगड़े के किसी भी बातों का जिक्र नहीं हुआ, क़रीबी रिश्तेदारों के साथ सम्बंद वापस सुधरने लगे, दिलों की नफ़रत खत्म होती नज़र आने लगी, निस्फिकर होकर एक दूसरे के प्रति विश्वास वापस मेहसूस होने लगे।
ये वो बदलाव हैं जो शायद होना नामुमकिन सा था। ये और कुछ नहीं एक दैविक शक्ति ही थी जिसने सालों की नफरत को बिना किसी फटकार के साथ प्यार में बदल दिया। ये वो दैविक शक्ति ही थी जिसने मुझे Guwahati जानने पर मजबूर कर दिया था। ये वो दैविक शक्ति ही थी जिसने दिलों को परिवर्तित कर दिया।
ये परिवर्तन अच्छा हैं।









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